कुछ बूढ़े लोगों का ये ख्याल होता है कि रोज़ा नहीं रख पाऊंगा रखूंगा तो मर जाऊंगा या बहुत तबियत ख़राब हो जाएगी तो क्या इस तरह रमज़ान का रोज़ा छोड़ सकते हैं और रोज़े के बदले में फिदिया दे तो अदा हो जाएगा*70

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*🌹ﺃﻋﻮﺫ ﺑﺎﻟﻠﻪ ﻣﻦ ﺍﻟﺸﻴﻄﺎﻥ ﺍﻟﺮﺟﻴﻢ 🌹ﺑِﺴْــــــــــــــــﻢِﷲِﺍﻟﺮَّﺣْﻤَﻦِﺍلرَّﺣِﻴﻢ*
*🌹السلام علیکم ورحمۃ اللہ وبر ر کا تہ*
*🌹الصــلوة والسلام عليك يارسول الله ﷺ*

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*_🌙 इस्लामी तारीख_*
*_23/09/1444_* 
*_रमज़ान मुबारक_* 
*_⛅ दिन; हफ़्ता_*                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                             
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*_15/04/2023_*     
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*🧮 पोस्ट 69▪️*


*📝 सवाल :-*
*📇 कुछ बूढ़े लोगों का ये ख्याल होता है कि रोज़ा नहीं रख पाऊंगा रखूंगा तो मर जाऊंगा या बहुत तबियत ख़राब हो जाएगी तो क्या इस तरह रमज़ान का रोज़ा छोड़ सकते हैं और रोज़े के बदले में फिदिया दे तो अदा हो जाएगा*


*✍️ जवाब :-* 
*📇 ताक़त न होना एक वाक़ई (सच मुच) होता है और एक कम हिम्मती (बुज़दिली) होता है कम हिम्मती (बुज़दिली) का कुछ एतिबार नहीं अक्सर औक़ात शैतान दिल में डालता है कि हमसे से यह काम हरगिज़ न हो सके और करेंगे तो मर जाएंगे बीमारी बढ़ जायेगी फिर जब खुदा पर भरोसा कर के किया जाता है तो अल्लाह तआ़ला अदा करा देता है कुछ भी नुक़सान नहीं पहुंचता मालूम होता है कि वो शैतान का धोका था 75 बरस उम्र में बहुत लोग रोज़े रखते हैं हां ऐसे कमज़ोर भी हो सकते हैं कि सत्तर ही बरस की उम्र में न रख सकें तो शैतान के वसवसों से बच कर खूब सही तौर पर जांचने चाहिए एक बात तो यह हुई*
*दूसरी यह कि इन (ज़ियादा उम्र वालों) में बाज़ (कुछ) को गर्मियों में रोज़ा की ताक़त वाक़ई नहीं होती मगर जाड़ों (सर्दियों) में रख सकते हैं यह भी कफ्फारा (रोज़े न रखने के बदले में फिदिया) नहीं दे सकते बल्कि गर्मियों में क़ज़ा (छोड़) कर के जाड़ों (सर्दियों) में रोज़े रखना उन पर फ़र्ज़ है तीसरी बात यह कि इन में बाज़ (कुछ) लगातार (रमज़ान के) महीना भर के रोज़े नहीं रख सकते मगर एक दो दिन बीच कर के रख सकते हैं तो जितने रख सकें उतने रखना फ़र्ज़ है जितने क़ज़ा हो (न रख पाए, छूट) जाएं (तो) जाड़ों (सर्दियों) में रख ले। चौथी बात यह है कि जिस जवान या बूढ़े को किसी बीमारी के सबब ऐसा जुअ़फ (कमज़ोर) हो कि रोज़ा नहीं रख सकते उन्हें भी कफ्फारा देने को इजाज़त नहीं बल्कि बीमारी जाने का इंतजार करें अगर शिफा (ठीक) होने से पहले मौत आ जाए तो (क़ब्ल मौत) कफ्फारा की वसिय्यत करदें*
*गर्ज़ यह है कि कफ्फारा इस वक़्त है कि रोज़ा न गर्मी में रख सके न जाड़े (सर्दियों) में न लगातार न मुतफ्फरिक (अलग अलग) और जिस उज़्र (हिला) के सबब ताक़त न हो उस उज़्र के जाने की उम्मीद न हो जैसे वह बूढ़ा कि बुढ़ापे ने उसे ऐसा ज़ईफ कर दिया कि गंडेदार रोज़ा (नागा कर के) मुतफर्रिक (अलग अलग) कर के जाड़े में भी नहीं रख सकता तो बुढ़ापा तो जाने की चीज़ नहीं ऐसे शख्स को कफ्फारा का हुक्म है हर रोज़े के बदले पौने दो सेर गेहूं उठनी ऊपर बरैली के तौल से या साढ़े तीन सेर जौ एक एक रुपया भर ऊपर दे उसे कफ्फारा का इख्तियार है कि रोज़ का रोज़ दे दे या महीना भर का पहले ही अदा कर दे या खत्मे माह (रमज़ान का महीना खत्म होने) के बाद कई फक़ीरों को दे या सब एक ही फ़क़ीर को दे सब जाइज़ है*

*📚 फतावा आला हज़रत सफा 79, 80*

*👉 नोट : अल्लाहु अक्बर कितनी तफसील से इसे समझने को मिला कि एक फ़र्ज़ की क्या अहमिय्यत होती है और शरीअत ने हमें किसी मुआमले में जबरदस्ती नहीं किया है कितनी आसानी दी है इन से उन सभी बूढ़े (मर्द औरत) जो बस उम्र का बहाना करते फिरते हैं और कुछ तो नौजवान (लड़का, लड़की) भी शामिल है उन सब को अपनी आखिरत का खौफ खानी चाहिए और अपनी हालत का जायज़ा (हिसाब) ले कि क्यों रोज़ा नहीं रखते क्या वजह है क्या हमें शरीअत ने इस मुआमले में कहा है कि रोज़ा छोड़ सकते हो (अगर नहीं) तो फिर डरो उस अज़ाब से जो इस के छोड़ने की वजह से मिलेगा अरे दुनियावी डॉक्टर साइंस सब भी कहते हैं कि साल में कम से कम 45 दिन भूखे रहना चाहिए इस से अंदर के कीड़े मर जायेंगे और तरह तरह के बीमारियों से महफूज़ रहोगे लेकिन हमारी शरीअत हमें पहले से हर चीज़ की तालीम देती है जिस में हमारे लिए भलाई ही भलाई है अल्लाह हमारे मुसलमान भाइयों और बहनों को अमल की तौफीक़ दे*

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*💉 अपनी औलादो में आला हज़रत की मोहब्बत डाल दो वरना बड़े होकर अपने मां बाप की कब्र पर जाना भी 😝शिर्क समझेंगे।*

*💓 हैं पुश्त-पनाह ग़ौषे आज़म​* 
*क्युं डरते हो तुम रज़ा किसी से*

*👏 अल्लाह हमे अपने महबूब हुज़ूर सल्लल्लाहों अलैहि वसल्लम के सदके तुफैल इल्मे दीन सीखने समझने और अमल करने की तौफ़िक अता करे।*
*▪ امیــــــن ▪*

*🔛((((( अगली पोस्ट जल्द )))))*



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*👏🏁 गदा ए फकीर रज़वी कादरी हनफी बरेलवी 🔴* *جزاک اللہ خیر*

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